Monday, December 18, 2017

छोटा बदलाव

हर करम पर ऊँगली उठाई इस ज़माने ने, करम न हुआ अपराध हो गया!
जिनको समझते थे की वो समझते हैं, वो ही हमारा थानेदार हो गया!
खुद ही इलज़ाम लगाया खुद ही करी सुनवाई, सज़ा ऐसी दी कि दिल बहुत दुखाया है!
आराम न उधर है न इधर है करार, सज़ा मिली मुझे दुःख दोनों ने पाया है!
वो कहें कि बदल गया उनका जना, मैंने समझा बदलाव तो समय की माया है!
समय बदल जाता है तो इंसान भी बदलेगा, हमें भी समय ने ही तो बनाया है!
अब बदलाव को गले अगर कोई न लगाए, फिर दोषी समय नहीं इंसान कहलाया है!
अब बदलाव से रिश्ते भी बदले हैं, पर सुकून तो किसी ने न पाया है!
आदत अगर बदलाव की ही पड़ जाये, सारा जग अपने क़दमों में पा जाएँ! 

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