बड़ी ही हसीं ज़िंदगी गुज़र रही थी ,
सारी खुशियां भी अपने साथ थीं।
खेलना, कूदना वो माँ का प्यार,
पापा का खिलोने लेकर आना बार बार।
अचानक एक सैलाब आया पढ़ाई का,
मौसम आया बस्ते उठाकर स्कूल जाने का।
दोस्त बने, दोस्त बिछड़े, पर हम न रुके यार,
कुछ इस तरह हमारी पढ़ाई के हुए पूरे 12 साल।
हमने सोचा अब तो छूटे भाई,
पर पढ़ाई ने की हमारी और ज़बरदस्त घिसाई।
हमने जाना छुटकारे का एक ही रास्ता है,
पढ़ाई करके कुछ साल, करके कामना है।
करके कमाने की बारी आयी तो पता चला,
यहाँ तो बेरोज़गारी का है बोल-बाला।
पर हमें इसे छूने का न मिला मौका,
क्रिकेटरों की तरह हमने मारा चौका।
थोड़ा संभलकर, कमाकर खाना सीखा तो है,
अभी आगे की और क्या कहें, नौकरी में हैं।
सारी खुशियां भी अपने साथ थीं।
खेलना, कूदना वो माँ का प्यार,
पापा का खिलोने लेकर आना बार बार।
अचानक एक सैलाब आया पढ़ाई का,
मौसम आया बस्ते उठाकर स्कूल जाने का।
दोस्त बने, दोस्त बिछड़े, पर हम न रुके यार,
कुछ इस तरह हमारी पढ़ाई के हुए पूरे 12 साल।
हमने सोचा अब तो छूटे भाई,
पर पढ़ाई ने की हमारी और ज़बरदस्त घिसाई।
हमने जाना छुटकारे का एक ही रास्ता है,
पढ़ाई करके कुछ साल, करके कामना है।
करके कमाने की बारी आयी तो पता चला,
यहाँ तो बेरोज़गारी का है बोल-बाला।
पर हमें इसे छूने का न मिला मौका,
क्रिकेटरों की तरह हमने मारा चौका।
थोड़ा संभलकर, कमाकर खाना सीखा तो है,
अभी आगे की और क्या कहें, नौकरी में हैं।
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